शिवानी शिवाजी रॉय की वापसी! जानें क्यों हर भारतीय के लिए 'मर्दानी 3' देखना जरूरी है।

हाल के दिनों में 'धुरंधर' और 'बॉर्डर 2' जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा रखा है। जहाँ 'धुरंधर' 1300 करोड़ का जादुई आंकड़ा पार कर चुकी है, वहीं 'बॉर्डर 2' भी अपनी व्यावसायिक सफलता के झंडे गाड़ रही है। लेकिन एक फिल्म समीक्षक और सामाजिक विश्लेषक के रूप में, मेरा मानना है कि केवल कलेक्शन ही किसी फिल्म की सार्थकता का पैमाना नहीं हो सकता। यशराज बैनर तले बनी, आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्मित और अभिराज मीनावाला द्वारा निर्देशित 'मर्दानी 3' एक ऐसी फिल्म है जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक मंथन' (Intellectual Churning) के लिए विवश करती है। यह फिल्म महज एक पुलिसिया ड्रामा नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना और चरमराती न्याय व्यवस्था पर एक तीखा प्रहार है। Watch On YouTube

Shivani Shivaji Roy Returns! Why Watching 'Mardaani 3' is a Must for Every Indian.
शिवानी शिवाजी रॉय की वापसी! जानें क्यों हर भारतीय के लिए 'मर्दानी 3' देखना जरूरी है।

1. इंसाफ के दो चेहरे: रसूख बनाम बेबसी

फिल्म की शुरुआत बुलंदशहर में दो बच्चियों के अपहरण से होती है, लेकिन कहानी जल्द ही सुंदरवन के उस भयावह इलाके में पहुँच जाती है जो मानव तस्करी का काला केंद्र बना हुआ है। यहाँ एक प्रभावशाली दृश्य में शिवानी शिवाजी रॉय (रानी मुखर्जी) को पीड़ितों के बीच वेश बदलकर (Undercover) बैठे हुए दिखाया गया है, जो उनकी जांबाज कार्यशैली को दर्शाता है।

फिल्म एक कड़वी विडंबना को उजागर करती है: पूरा पुलिस तंत्र और आला अधिकारी केवल इसलिए सक्रिय होते हैं क्योंकि अपहृत लड़कियों में से एक 'राजदूत' (Ambassador) की बेटी है। जबकि उसी जिले से पिछले तीन महीनों में दर्जनों बच्चियां गायब हुई हैं, जिनकी फाइलें थानों के किसी कोने में धूल फांक रही हैं। यह इस बात का स्पष्ट चित्रण है कि हमारा कानून अमीरों के लिए रेड कारपेट बिछाता है और गरीबों के लिए सिर्फ तारीखें देता है।

"यह कैसा इंसाफ है, कैसी पुलिस है जो सिर्फ बड़े लोगों का ख्याल रखती है, छोटे लोगों का नहीं?" — शिवानी शिवाजी रॉय

2. बॉलीवुड की पारंपरिक बेड़ियों से मुक्ति: 'ट्रेंड-फॉरवर्डर' सिनेमा

अक्सर बॉलीवुड की 'मसाला' फिल्मों में देखा जाता है कि एक गंभीर एक्शन सीन के बाद नायक अचानक किसी काल्पनिक दुनिया में नाचने-गाने लगता है। 'मर्दानी 3' इस वाहियात परंपरा को तोड़ती है। इसमें कोई फालतू गाना या नाच-गाना नहीं है जो फिल्म की गंभीरता को कम करे। यह फिल्म विद्या बालन की फिल्मों या 'दंगल' जैसे 'ट्रेंडसेटर' सिनेमा द्वारा बनाए गए रास्ते पर चलने वाली एक 'ट्रेंड-फॉरवर्डर' फिल्म है।

रानी मुखर्जी का 'लेडी सिंघम' वाला अवतार वास्तव में वास्तविक जीवन की न्याय व्यवस्था में जनता के टूटते भरोसे का सिनेमाई जवाब है। जब असल जिंदगी में इंसाफ मिलने में दशकों लग जाते हैं, तब दर्शक पर्दे पर एक 'एंग्री यंग वुमन' को अपने दम पर गुंडों को कुचलते देख मानसिक सुकून पाते हैं।

3. समाज की कड़वी सच्चाई: पितृसत्तात्मक उदासीनता का भयावह चेहरा

फिल्म बाल तस्करी और बच्चियों पर होने वाले मेडिकल एक्सपेरिमेंट जैसे रोंगटे खड़े कर देने वाले मुद्दे को उठाती है। लेकिन फिल्म का सबसे डरावना हिस्सा वह तर्क है जो खलनायक देता है। वह कहता है कि वह 9 से 13 साल की लड़कियों को इसलिए चुनता है क्योंकि समाज और उनके खुद के परिवार उन्हें 'बोझ' समझते हैं।

खलनायक का यह संवाद हमारी पितृसत्तात्मक और संवेदनहीन मानसिकता पर एक जोरदार तमाचा है। वह अपराधियों के हौसले से ज्यादा समाज की चुप्पी और उदासीनता को अपराधी मानता है। यह हिस्सा दर्शाता है कि लड़कियों के लिए उनकी सुरक्षा से ज्यादा बड़ा खतरा समाज की 'नजरअंदाजी' है।

"उनकी जिंदगी तो पहले से ही नरक है, मैं तो बस उनका बेहतर इस्तेमाल कर रहा हूं।" — खलनायक

4. एक बड़ी तकनीकी चूक: POCSO बनाम POSCO

एक गंभीर समीक्षक के तौर पर, यशराज जैसे बड़े बैनर की फिल्म में रिसर्च की कमी खटकती है। फिल्म में रानी मुखर्जी जैसी वरिष्ठ अधिकारी बार-बार बाल यौन अपराध संरक्षण कानून 'POCSO Act' (Protection of Children from Sexual Offences) को 'POSCO' (पोस्को) बोलती हैं।

यह सुनना काफी अजीब लगता है, क्योंकि 'POSCO' एक वैश्विक स्टील कंपनी का नाम है, न कि कोई कानून। जब मुख्य पात्र पूरे आत्मविश्वास के साथ "मैं तुम पर पोस्को लगा दूंगी" कहता है, तो यह फिल्म की विश्वसनीयता को चोट पहुँचाता है। इतने बड़े बजट की फिल्म में क्या कोई एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं था जिसने कानून का सही नाम जांचा हो?

निष्कर्ष: रील लाइफ का सुकून बनाम रियल लाइफ का सन्नाटा

'मर्दानी 3' हमें एक ऐसी काल्पनिक जीत का अहसास कराती है जिसकी हम असल जिंदगी में चाहत रखते हैं। आज जब 'एबस्टीन फाइल्स' (Epstein Files) जैसे अंतरराष्ट्रीय मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ रसूखदार लोगों के नाम आने पर 'वैश्विक चुप्पी' (Global Silence) साध ली जाती है, तब शिवानी शिवाजी रॉय जैसे किरदार हमें एक क्षणिक राहत देते हैं।

फिल्म के अंत में दर्शक संतुष्ट तो होते हैं, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर एक चुभता हुआ सवाल बाकी रह जाता है:

"क्या वास्तव में हमारे सिस्टम में कभी कोई ऐसी 'शिवानी शिवाजी रॉय' आएगी जो ताकतवर चेहरों से नकाब उतार सके, या हम केवल सिनेमा के अंधेरे हॉल में ही इंसाफ का जश्न मनाते रहेंगे?"


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