Roopkund झील में कंकाल और हड्डियाँ तैरती है

Roopkund झील में कंकाल और हड्डियाँ तैरती है - आज भी भारत की पहचान  संस्कृति, सभ्यता, भाषा, खान-पान और विरासत से की जाती है।

जहां एक तरफ संस्कृति  हैं तो वहीँ दूसरी और कई रूढ़ियां, अंधविश्वास , जादू टोना, भूत प्रेत और रहस्य भी हैं।

भारत में कई  ऐसे रहस्य हैं  जिनके आगे साइंस ने भी अपने घुटने टेक दिए हैं, क्योंकि इन अनोखे रहस्यों का पता लगाने में आज साइंस और टेक्नोलॉजी भी पीछे रह गयी है।

ऐसा इसलिए कि अब तक साइंस को भी इन रहस्यों कुछ पता नहीं लगा है।

आज हम आपको बताते है भारत की एक ऐसी रहस्यमयी जगह के बारे में जिसके बारे में  तांत्रिकों बाबाओं के अलावा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने भी अलग-अलग मत दिए हैं। हम बात कर रहे है रूपकुंड झील की।

रूपकुंड झील (Roopkund lake)


रूपकुंड झील (Roopkund lake) हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों में  बनने वाली छोटी सी झील हैं।

यह झील 5029 मीटर ( 16499 फीट) कि ऊचाई पर स्तिथ हैं जिसके चारो और ऊचे ऊचे बर्फ के ग्लेशियर हैं।

यहाँ तक पहुचे का रास्ता बेहद दुर्गम हैं इसलिए यह जगह एडवेंचर ट्रैकिंग करने वालों कि पसंदीदा जगह हैं। यह झील यहाँ पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित हैं।

यहाँ पर गर्मियों मैं बर्फ पिघलने के साथ ही कही पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात हैं। यहाँ तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी मैं भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं।

Roopkund इस झील में कंकाल और हड्डियाँ तैरती है

नरकंकाल 1942 में H. K. Madhwal द्वारा खोज गया


यहाँ पर सबसे पहला नरकंकाल 1942 मैं एक रेंजर H. K. Madhwal द्वारा खोज गया था। तब से अब तक यहाँ पर सैकड़ो नरकंकाल मिल चुके हैं।

जिसमे हर उम्र व लिंग के कंकाल शामिल हैं। यहाँ पर National Geographic Team द्वारा भी एक अभियान चलाया गया था जिसमे उन्हें 30 से ज्यादा नरकंकाल मिले थे।

यहाँ पर इतने सारे नरकंकाल आये कैसे इसके बारे मैं तीन अलग अलग कहानिया प्रचलित हैं।

ओलों की एक भयंकर बारिश

1942 में हुए एक रिसर्च से हड्डियों के इस राज पर थोड़ी रोशनी पड़ सकती है। रिसर्च के अनुसार ट्रेकर्स का एक ग्रुप यहां हुई ओलावृष्टि में फंस गया ।

जिसमें सभी की अचानक और दर्दनाक मौत हो गई। हड्डियों के एक्स-रे और अन्य टेस्ट्स में पाया गया कि हड्डियों में दरारें पड़ी हुई थीं ।

Roopkund इस झील में कंकाल और हड्डियाँ तैरती है

जिससे पता चलता है कि कम से कम क्रिकेट की बॉल की साइज़ के बराबर ओले रहे होंगे। वहां कम से कम 35 किमी तक कोई गांव नहीं था और सिर छुपाने की कोई जगह भी नहीं थी।

आंकड़ों के आधार पर माना जा सकता है कि यह घटना 850AD के आस पास की रही होगी।

सैनिक रास्ता भटक गए 

एक दूसरी किवदंती के मुताबिक तिब्बत में 1841 में हुए युद्ध के दौरान सैनिकों का एक समूह इस मुश्किल रास्ते से गुज़र रहा था।

Roopkund इस झील में कंकाल और हड्डियाँ तैरती है

लेकिन वो रास्ता भटक गए और खो गए और कभी मिले नहीं। हालांकि यह एक फिल्मी प्लॉट जैसा लगता है पर यहां मिलने वाली हड्डियों के बारे में यह कथा भी खूब प्रचलित है।

नंदा देवी की नाराज़गी 

अगर स्थानीय लोगों के माने तो उनके अनुसार एक बार एक राजा जिसका नाम जसधावल था, नंदा देवी की तीर्थ यात्रा पर निकला।

उसको संतान की प्राप्ति होने वाली थी इसलिए वो देवी के दर्शन करना चाहता था। स्थानीय पंडितों ने राजा को इतने भव्य समारोह के साथ देवी दर्शन जाने को मना किया।


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जैसा कि तय था, इस तरह के जोर-शोर और दिखावे वाले समारोह से देवी नाराज़ हो गईं और सबको मौत के घाट उतार दिया।

राजा, उसकी रानी और आने वाली संतान को सभी के साथ खत्म कर दिया गया। मिले अवशेषों में कुछ चूड़ियां और अन्य गहने मिले जिससे पता चलता है कि समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं।

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